पर्यावरण और घरेलू अर्थव्यवस्था दोनों के लिए साइकिल को बढ़ावा देने की आवश्यकता — डॉ. शैलेश शुक्ला

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डॉ. शैलेश शुक्ला
आज का युग तीव्र गति, आधुनिक तकनीक और सुविधाओं का युग है। मोटरसाइकिल, कार और अन्य मोटर चालित वाहन हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए भी लोग वाहनों का उपयोग करने लगे हैं। सुविधाओं के इस विस्तार ने जीवन को आसान अवश्य बनाया है, लेकिन इसके साथ अनेक नई समस्याएं भी पैदा हुई हैं। बढ़ता वायु प्रदूषण, ईंधन की बढ़ती खपत, विदेशी मुद्रा पर बढ़ता बोझ, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में वृद्धि और घरेलू बजट पर बढ़ता दबाव आज हमारे सामने गंभीर चुनौतियों के रूप में मौजूद हैं। इन समस्याओं का एक सरल, सस्ता, व्यावहारिक और प्रभावी समाधान साइकिल के व्यापक उपयोग में छिपा हुआ है।

साइकिल केवल एक साधारण परिवहन साधन नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक बचत, स्वास्थ्य संवर्धन और राष्ट्रीय विकास का एक शक्तिशाली माध्यम है। दुर्भाग्यवश आधुनिकता की चमक में साइकिल का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया। जो साइकिल कभी आम नागरिकों की पहचान हुआ करती थी, वह आज कई लोगों के लिए केवल एक खेल या शौक की वस्तु बनकर रह गई है। जबकि वास्तविकता यह है कि यदि साइकिल को पुनः दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए तो इससे व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी को बहुआयामी लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

भारत विश्व के सबसे बड़े पेट्रोलियम आयातक देशों में से एक है। देश अपनी आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसके लिए हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं, परिवहन लागत बढ़ती है और महंगाई पर दबाव बढ़ जाता है। यदि देश में छोटी दूरी की यात्राओं के लिए अधिक से अधिक लोग साइकिल का उपयोग करना शुरू कर दें तो पेट्रोल और डीजल की खपत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

भारत के शहरों में बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन पाँच से दस किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। यह दूरी साइकिल से आसानी से तय की जा सकती है। यदि लाखों लोग प्रतिदिन मोटरसाइकिल या कार के स्थान पर साइकिल का उपयोग करें तो प्रतिदिन लाखों लीटर ईंधन की बचत संभव है। इसका सीधा लाभ देश की विदेशी मुद्रा बचत के रूप में सामने आएगा। जो धन विदेशों से तेल खरीदने में खर्च होता है, उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

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साइकिल का दूसरा बड़ा लाभ घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। आज एक मध्यमवर्गीय परिवार के मासिक बजट का बड़ा हिस्सा पेट्रोल और वाहन रखरखाव पर खर्च होता है। पेट्रोल, सर्विसिंग, इंश्योरेंस, मरम्मत और अन्य खर्च मिलाकर यह राशि हजारों रुपये तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत साइकिल का रखरखाव अत्यंत सस्ता है। इसमें न पेट्रोल की आवश्यकता होती है, न इंजन ऑयल की और न ही महंगे रखरखाव की। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन के छोटे-छोटे कार्यों के लिए साइकिल का उपयोग करता है तो वह वर्षभर में हजारों रुपये की बचत कर सकता है। यह बचत परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की आवश्यकताओं पर खर्च की जा सकती है।

साइकिल का सबसे बड़ा लाभ स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिखाई देता है। आज जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, हृदय रोग और तनाव जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं। इन बीमारियों के उपचार पर परिवारों को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। नियमित साइकिल चलाना एक उत्कृष्ट व्यायाम है। इससे शरीर के लगभग सभी अंग सक्रिय रहते हैं। हृदय मजबूत होता है, रक्त संचार बेहतर होता है, वजन नियंत्रित रहता है और मानसिक तनाव कम होता है।

यदि समाज का बड़ा वर्ग नियमित रूप से साइकिल चलाने लगे तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। जब लोग स्वस्थ रहेंगे तो अस्पतालों, दवाइयों और चिकित्सा सेवाओं पर होने वाला खर्च भी कम होगा। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा।

भारत हर वर्ष बड़ी मात्रा में चिकित्सा उपकरणों, उन्नत मशीनों और अनेक दवाइयों का आयात करता है। यदि लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होगा तो गंभीर बीमारियों की संख्या कम होगी और चिकित्सा संसाधनों की मांग भी अपेक्षाकृत कम होगी। इसका अप्रत्यक्ष लाभ देश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले अनावश्यक खर्चों में कमी आने से राष्ट्रीय संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकेगा।

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स्वस्थ नागरिक किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक ऊर्जा के साथ कार्य कर सकता है। उसकी कार्यक्षमता बेहतर होती है और वह अधिक उत्पादक होता है। जब लाखों लोग स्वस्थ होंगे तो उद्योगों, कृषि, सेवा क्षेत्र और अन्य आर्थिक गतिविधियों में उनकी उत्पादकता बढ़ेगी। इससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी और आर्थिक विकास को गति मिलेगी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो साइकिल केवल स्वास्थ्य सुधारने का साधन नहीं है, बल्कि यह आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने का भी माध्यम है।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में साइकिल का महत्व और भी अधिक है। साइकिल चलाने से किसी प्रकार का धुआं या प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता। यह पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल परिवहन साधन है। आज दुनिया के अनेक शहर वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। भारत के कई बड़े शहर भी प्रदूषित हवा के कारण स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं। यदि छोटी दूरी की यात्राओं के लिए साइकिल का उपयोग बढ़े तो वाहनों की संख्या कम होगी और वायु प्रदूषण में कमी आएगी।

साइकिल ध्वनि प्रदूषण को भी कम करने में सहायता करती है। मोटर चालित वाहनों से निकलने वाला शोर शहरी जीवन की एक बड़ी समस्या बन चुका है। साइकिल लगभग निःशब्द चलती है और शहरों को अधिक शांत तथा रहने योग्य बनाने में योगदान देती है।

यातायात जाम की समस्या भी साइकिल के बढ़ते उपयोग से काफी हद तक कम की जा सकती है। महानगरों और बड़े शहरों में लाखों लोग प्रतिदिन घंटों ट्रैफिक में फंसे रहते हैं। इससे समय, ईंधन और ऊर्जा तीनों की बर्बादी होती है। साइकिल कम जगह घेरती है और यातायात व्यवस्था को अधिक सुगम बनाने में सहायता करती है।

साइकिल का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष भी है। यह एक ऐसा परिवहन साधन है जिसे समाज का लगभग हर वर्ग वहन कर सकता है। महंगी कारों और मोटरसाइकिलों की तुलना में साइकिल आर्थिक रूप से अधिक सुलभ है। इससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों को कम लागत में गतिशीलता प्राप्त होती है। यह सामाजिक समानता को भी प्रोत्साहित करती है।

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विश्व के अनेक विकसित देशों ने साइकिल संस्कृति को बढ़ावा दिया है। वहां विशेष साइकिल ट्रैक बनाए गए हैं, साइकिल उपयोग करने वालों को प्रोत्साहन दिया जाता है और शहरी नियोजन में साइकिल को प्राथमिकता दी जाती है। परिणामस्वरूप वहां प्रदूषण कम है, नागरिक अधिक स्वस्थ हैं और शहर अधिक व्यवस्थित हैं। भारत भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है।

सरकारों को साइकिल-अनुकूल आधारभूत संरचना विकसित करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सुरक्षित साइकिल लेन, साइकिल पार्किंग, सार्वजनिक साइकिल साझा व्यवस्था और जागरूकता अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सरकारी कार्यालयों में भी साइकिल उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि समाज साइकिल को गरीबी का प्रतीक मानने की मानसिकता से बाहर निकले। वास्तव में साइकिल आधुनिक और जिम्मेदार जीवनशैली का प्रतीक है। आज दुनिया के अनेक संपन्न और शिक्षित लोग पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के कारण साइकिल का उपयोग कर रहे हैं। हमें भी साइकिल को सम्मान और गर्व के साथ अपनाना चाहिए।

आज जब देश ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सुधार और आर्थिक बचत जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब साइकिल एक ऐसा समाधान प्रस्तुत करती है जो सरल भी है और प्रभावी भी। यह व्यक्ति के स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, परिवार के खर्च को कम करती है, देश की विदेशी मुद्रा बचाती है, प्रदूषण घटाती है, उत्पादकता बढ़ाती है और सतत विकास को प्रोत्साहित करती है।

यदि भारत के करोड़ों नागरिक प्रतिदिन की छोटी यात्राओं के लिए साइकिल को अपनाने का संकल्प लें तो इसका प्रभाव केवल सड़कों पर नहीं दिखाई देगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक रूप से परिलक्षित होगा। इसलिए समय की मांग है कि साइकिल को केवल एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वस्थ भारत के अभियान के रूप में देखा जाए। साइकिल का पहिया जितना अधिक घूमेगा, उतना ही मजबूत परिवार, स्वस्थ समाज और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होगा।

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